परीक्षा का क्षण
DIARY
10/12/20241 min read
समय मेरी परीक्षा ले रहा है और इन क्षणों ने मुझे कई बार हताश भी किया है। मेरे मन ने अनेक भय उत्पन्न किए और भविष्य की किरणों से दूर कर मुझे अंधकार की ओर धकेल दिया। परंतु इस कठिन समय ने मुझे पुनः परमात्मा के समीप ला खड़ा किया है, जिसके लिए मैं हृदय से उनका आभार व्यक्त करता हूँ।
इस दौरान मैंने परमात्मा से प्रार्थना की, और जानना चाहेंगे कि वह क्या है:
“हे भगवन्! मेरे लिए धर्म की समझ और इस देह का कर्तव्य यह प्रतीत होता है कि मैं अपने लोगों की सेवा करूँ। मेरी समस्त ऊर्जा और शक्तियों को मानवता के कल्याण में समर्पित कर दूँ। इस संकल्प को सिद्ध करने में आप मेरी सहायता करें।
हे जगतपिता! आपकी भक्ति और आपसे प्रेम करना मेरे लिए न केवल आत्मिक शुद्धि का माध्यम है, बल्कि यह एक अनमोल वरदान भी है। मैं शुद्ध हृदय से आपकी सेवा करना चाहता हूँ, भक्ति और प्रेम के माध्यम से। इसके प्रतिफल स्वरूप यदि कोई भी फल मुझे प्राप्त हो, तो कृपा करके उसे मेरे लोगों में बाँट दें।
हे सर्वज्ञ! मुझे यह चिंता रहती है कि कहीं मैं किसी मोह और बंधन में न उलझ जाऊँ। परंतु भीतर यह विश्वास भी है कि आपकी भक्ति मुझे मोह, काम और क्रोध से दूर रखेगी। फिर भी मेरी विनम्र प्रार्थना है कि आप मुझे ‘अहंकार और मैं’ के भाव से दूर रखें और मोह, काम और क्रोध से मेरी रक्षा करें।
हे परमपिता! मुझे भारत की सेवा और मानवता के कल्याण के लिए इस देह से सक्षम बनाएं। यह आत्मा, हृदय, बुद्धि और मन सब आपकी सेवा के लिए ही हैं।”
